जेनेटिक टेस्टिंग से सुधरेंगी देसी नस्लें, पशुपालकों की बढ़ेगी कमाई और मिलेगी राष्ट्रीय पहचान

उत्तर प्रदेश में देसी पशु नस्लों को बचाने और सुधारने के लिए जेनेटिक परीक्षण शुरू किया गया है. पहले चरण में बकरी और भेड़ पर काम हो रहा है. इस पहल से मजबूत नस्लें तैयार होंगी, जो स्थानीय मौसम में टिकाऊ होंगी और पशुपालकों की आय बढ़ाने में मदद करेंगी.

Saurabh Sharma
नोएडा | Updated On: 4 May, 2026 | 12:46 PM

Genetic Testing: अब देसी पशुओं (Indigenous Breeds) की किस्मत बदलने वाली है. जो नस्लें धीरे-धीरे खत्म हो रही थीं, अब उन्हें नई पहचान और नई ताकत मिलने वाली है. उत्तर प्रदेश में सरकार ने देसी नस्लों को बचाने और बेहतर बनाने के लिए जेनेटिक परीक्षण की शुरुआत की है. इसका सीधा फायदा पशुपालकों को होगा, क्योंकि इससे उनकी आय बढ़ेगी और मजबूत, रोगों से लड़ने वाली नस्लें तैयार होंगी.

देसी नस्लों को बचाने के लिए नई पहल

प्रदेश में बड़ी संख्या में देसी नस्ल के पशु  हैं, लेकिन समय के साथ इनका महत्व कम होता जा रहा था. ज्यादा दूध पाने के लिए विदेशी नस्लों का इस्तेमाल किया गया, जिससे देसी नस्लें कमजोर पड़ गईं. कई बार ये नई नस्लें स्थानीय मौसम में ठीक से नहीं टिक पाईं और पशुपालकों को नुकसान हुआ. इसी को देखते हुए अब सरकार ने देसी नस्लों को बचाने और सुधारने की नई योजना बनाई है. इसके तहत इन पशुओं का जेनेटिक परीक्षण किया जाएगा, जिससे उनकी असली पहचान और खासियत सामने आएगी.

पहले चरण में बकरी और भेड़ पर फोकस

इस योजना के पहले चरण में जौनपुरी बकरी और अवधी भेड़  को चुना गया है. इन नस्लों की पहचान कर इनके जेनेटिक गुणों का अध्ययन किया जा रहा है. दूसरे चरण में गायों की अलग-अलग देसी प्रजातियों पर काम किया जाएगा. इसमें गंगातीरी, केनकथा, साहीवाल, मेवती जैसी नस्लें शामिल होंगी. सरकार का लक्ष्य है कि हर क्षेत्र की खास नस्ल को पहचान दी जाए और उसे बेहतर बनाया जाए.

जिलेवार हो रही पहचान और रिसर्च

सरकार अब जिलेवार देसी नस्लों  की पहचान कर रही है. जौनपुर के जफराबाद और शाहगंज में जौनपुरी बकरी को चिन्हित किया गया है. वहीं अयोध्या और बाराबंकी में अवधी नस्ल पर काम हो रहा है. आने वाले समय में बलिया, गाजीपुर और चंदौली की गंगातीरी गाय को भी शामिल किया जाएगा. बुंदेलखंड की केन नस्ल, लखीमपुर की खेरीगढ़ी और पश्चिमी यूपी की साहीवाल नस्ल पर भी रिसर्च होगा. इससे हर इलाके की खास नस्ल को पहचान मिलेगी.

किसानों को कैसे होगा फायदा?

इस योजना का सबसे बड़ा फायदा पशुपालकों को मिलेगा. जेनेटिक परीक्षण के बाद ये पता चलेगा कि कौन सी नस्ल किस काम में बेहतर है. इसके आधार पर क्रॉस ब्रीडिंग (संकरण) की जाएगी, जिससे नई और ज्यादा उपयोगी नस्लें तैयार होंगी. ये नई नस्लें स्थानीय मौसम के अनुसार मजबूत होंगी और बीमारियों से भी ज्यादा लड़ सकेंगी. इससे पशुओं की उत्पादकता बढ़ेगी और किसानों की आमदनी भी बढ़ेगी. कम खर्च में ज्यादा फायदा मिलने की संभावना है.

सरकार और वैज्ञानिक मिलकर कर रहे काम

इस पूरे प्रोजेक्ट में कृषि विश्वविद्यालय और पशु शोध संस्थान मिलकर काम कर रहे हैं. नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इस परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं. सरकार की नंद बाबा दुग्ध मिशन और मुख्यमंत्री प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना के जरिए भी देसी नस्लों के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि देसी नस्लों को बचाना बहुत जरूरी है, क्योंकि ये हमारे मौसम और पर्यावरण के हिसाब से सबसे बेहतर होती हैं.

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Published: 4 May, 2026 | 12:46 PM
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