Luit Buffalo Breed : आप अगर असम की वादियों और ब्रह्मपुत्र नदी के किनारों पर घूमें, तो आपको काले रंग की एक बेहद ताकतवर और शांत मिजाज वाली भैंस नजर आएगी. इसे वहां के लोग प्यार से लुइट (Luit) कहते हैं. लुइट असल में ब्रह्मपुत्र नदी का ही एक पुराना नाम है. यह सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि असम के किसानों के परिवार का हिस्सा है. चाहे भीषण बाढ़ आए या चारे की कमी हो, लुइट भैंस हर मुश्किल को हंसते-हंसते झेल लेती है. आज के दौर में जहां विदेशी नस्लें बीमारियों से घिरी रहती हैं, वहीं लुइट अपनी मजबूती से किसानों का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है.
बाढ़ हो या सूखा, हर हाल में है पक्की यार
लुइट भैंस की सबसे बड़ी खासियत इसका जुझारूपन है. असम में हर साल आने वाली बाढ़ में जब सब कुछ डूब जाता है, तब भी यह भैंस नदी के टापुओं और जंगलों में खुद को सुरक्षित रखती है. यह दलदली (Swamp) नस्ल की भैंस है, जिसे कीचड़ और पानी में रहना बेहद पसंद है. किसानों को इसकी देखभाल के लिए बहुत ज्यादा खर्चा नहीं करना पड़ता. ये नदी के किनारों पर उगने वाली घास खाकर ही तंदुरुस्त रहती हैं. कम संसाधनों में पलने वाली यह भैंस छोटे किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.
खेतों की जुताई से लेकर दूध की मलाई तक
असम के धान के खेतों में जब ट्रैक्टर फेल हो जाते हैं, तब लुइट भैंस ही काम आती है. इसकी मजबूती की वजह से किसान इसे खेतों की जुताई के लिए इस्तेमाल करते हैं. लेकिन इसकी असली ताकत इसके दूध में छिपी है. हालांकि यह बहुत ज्यादा मात्रा में दूध नहीं देती, लेकिन इसके दूध में वसा (Fat) की मात्रा 8 फीसदी से भी ज्यादा होती है. इसके गाढ़े दूध से बना घी और दही इतना लाजवाब होता है कि बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है. लोग इसके घी को शुद्धता की गारंटी मानते हैं.
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काली काया और चांद जैसे सींग
दिखने में लुइट भैंस काफी आकर्षक होती है. इसका रंग गहरा काला होता है और इसके पैरों पर सफेद निशान ऐसे लगते हैं जैसे इसने सफेद मोजे (स्टॉकिंग्स) पहन रखे हों. इसके सींग आधे गोले की तरह पीछे की ओर मुड़े होते हैं, जो इसे एक शाही लुक देते हैं. असम के किसान इन्हें बड़े-बड़े झुंडों में पालते हैं, जिन्हें वहां के स्थानीय भाषा में खूती कहा जाता है. ये झुंड नदी के टापुओं पर खुले आसमान के नीचे रहते हैं, जो वहां की संस्कृति और जैव-विविधता का एक अहम हिस्सा हैं.
जितुल बुरागोहेन की मेहनत और लुइट को मिला सम्मान
कहते हैं कि अगर कोई इंसान ठान ले तो एक पूरी नस्ल को लुप्त होने से बचा सकता है. असम के किसान जितुल बुरागोहेन ने यही कर दिखाया. उन्होंने लुइट भैंस के संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. उनकी इसी मेहनत का नतीजा है कि आज लुइट भैंस को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है और जितुल को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. आज लुइट भैंस असम के किसानों के लिए सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि उनकी विरासत को बचाने की एक सफल मुहिम बन चुकी है.