kharif crops MSP: देश के किसान एक बार फिर मुश्किल हालात और उम्मीद के बीच खड़े नजर आ रहे हैं. खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों की कटाई के समय यानी अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच किसानों को उनकी उपज के पूरे दाम नहीं मिल पाए. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि धान को छोड़कर लगभग सभी खरीफ फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP से 9 से 30 प्रतिशत तक कम दामों पर बिकीं. इसके बावजूद किसान पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और रबी सीजन में उन्होंने फसल का रकबा बढ़ाकर यह संकेत दिया है कि खेती पर उनका भरोसा अब भी कायम है.
धान को छोड़ बाकी खरीफ फसलें MSP से नीचे
एगमार्कनेट पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान केवल सामान्य धान ही ऐसी फसल रही जिसे MSP से थोड़ा बेहतर दाम मिला. पूरे देश में धान का औसत भाव 2,407 रुपये प्रति क्विंटल रहा, जो इसके MSP 2,389 रुपये से करीब 1 प्रतिशत अधिक था. लेकिन इसके अलावा मक्का, ज्वार, बाजरा, दालें, तिलहन और कपास जैसी फसलों में किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा.
मक्का किसानों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब रही. देशभर में मक्का का औसत भाव केवल 1,684 रुपये प्रति क्विंटल रहा, जबकि MSP 2,400 रुपये था. यानी करीब 30 प्रतिशत की सीधी चोट. मध्य प्रदेश में हालात और भी खराब रहे, जहां किसानों को मक्का के लिए औसतन 1,582 रुपये प्रति क्विंटल ही मिले.
ज्वार और बाजरा की बात करें तो ज्वार का औसत भाव 3,357 रुपये प्रति क्विंटल रहा, जो MSP से 9 प्रतिशत कम था. वहीं बाजरा 2,318 रुपये प्रति क्विंटल पर बिका, जो इसके MSP से 16.5 प्रतिशत कम रहा.
दाल और तिलहन किसानों की भी टूटी उम्मीद
दालों की कीमतों में भी भारी गिरावट देखने को मिली. मूंग का औसत भाव 6,575 रुपये प्रति क्विंटल रहा, जो MSP से 25 प्रतिशत कम था. अरहर यानी तूर 6,599 रुपये प्रति क्विंटल पर बिकी, जो MSP से 17.5 प्रतिशत कम रही. उड़द का औसत भाव 6,090 रुपये रहा, यानी करीब 22 प्रतिशत की गिरावट.
राज्य स्तर पर देखें तो कर्नाटक में मूंग सबसे सस्ती रही और वहां किसानों को सिर्फ 4,949 रुपये प्रति क्विंटल मिले. राजस्थान में तूर 5,040 रुपये और तेलंगाना में उड़द 4,804 रुपये प्रति क्विंटल तक सिमट गई.
सोयाबीन और मूंगफली जैसी तिलहनी फसलों ने भी निराश किया. सोयाबीन का औसत भाव 4,197 रुपये प्रति क्विंटल रहा, जो MSP से 21 प्रतिशत कम था. महाराष्ट्र में किसानों को सबसे कम दाम मिले, जहां औसत भाव 4,186 रुपये रहा. मूंगफली 5,583 रुपये प्रति क्विंटल पर बिकी, जो MSP से 23 प्रतिशत कम थी. हरियाणा में मूंगफली का भाव सबसे कम 4,821 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया.
कपास उत्पादक भी दबाव में
नकदी फसल कपास की स्थिति भी बेहतर नहीं रही. लंबा रेशा कपास औसतन 7,034 रुपये प्रति क्विंटल पर बिका, जबकि इसका MSP 8,110 रुपये था. यानी करीब 13 प्रतिशत की सीधी कटौती किसानों की आमदनी में दर्ज हुई.
खेती की आय पर असर, GVA की रफ्तार धीमी
कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों का देश की अर्थव्यवस्था में करीब 17 प्रतिशत योगदान है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन यानी GVA 25.54 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जिसकी वृद्धि दर 3.1 प्रतिशत बताई गई है. पिछले वित्त वर्ष 2025 में यह 24.77 लाख करोड़ रुपये थी और तब विकास दर 4.6 प्रतिशत रही थी.
वर्तमान कीमतों पर वास्तविक GVA की बात करें तो FY26 में यह बढ़कर 54.28 लाख करोड़ रुपये पहुंची, जबकि FY25 में यह 53.85 लाख करोड़ रुपये थी. यानी वृद्धि दर केवल 0.8 प्रतिशत रही, जो बीते साल की तुलना में काफी कम है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसका मुख्य कारण यही है कि उत्पादन अच्छा रहने के बावजूद बाजार में फसलों के दाम गिर गए.
रिकॉर्ड उत्पादन के बीच दामों की चुनौती
सरकार ने 2025-26 के लिए खरीफ खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान रिकॉर्ड 173.33 मिलियन टन लगाया है, जो पिछले साल से 2.3 प्रतिशत अधिक है. वहीं रबी सीजन 2024-25 का उत्पादन भी रिकॉर्ड 169.17 मिलियन टन रहा, जिसमें 5.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. अप्रैल से रबी फसल की आवक शुरू होने पर इसका असर FY26 के GVA आंकड़ों में दिखेगा.
रबी में बढ़ी बुवाई, किसानों की उम्मीद कायम
खरीफ में नुकसान झेलने के बावजूद किसानों ने रबी सीजन में करीब 3 प्रतिशत ज्यादा क्षेत्र में बुवाई की है, खासकर गेहूं के तहत. यह बताता है कि किसान अभी भी बेहतर मौसम, अच्छी पैदावार और सरकारी समर्थन की उम्मीद लगाए बैठे हैं.