राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (RARI) के कृषि वैज्ञानिकों ने जौ की खास किस्म विकसित की है, जो कुछ मामलों में गेहूं से भी बेहतर है. इसे पशुओं के साथ ही इंसानों के लिए भी सुपरफूड बताया गया है. इसकी थ्रेसिंग के बाद यह बिल्कुल गेहूं की तरह दिखता है और कई बार फसल भी इसकी गेहूं की तरह ही दिखती है. वैज्ञानिकों ने इसे हललेस जौ बताया है. वहीं, एंटीऑक्सीडेंट, आयरन और जिंक की भरपूर मात्रा वाले काले चने की खास किस्म भी विकसित की गई है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इन नई किस्मों के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सराहना की है.
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजस्थान के जयपुर में दुर्गापुरा स्थित राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (RARI) का दौरा किया. यहां पर कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि जौ की उन्नत किस्में विकसित की जा रही हैं. सिक्स-रो जौ की तुलना में टू-रो जौ का उत्पादन कम होता है, इसलिए यहां ऐसी किस्में विकसित की जा रही हैं, जो दोनों के बराबर पैदावार दे सकें. कृषि अनुसंधान संस्थान ने हललेस जौ की एक किस्म भी विकसित की है, जिसमें छिलका नहीं होता और जो गेहूं की तरह दिखाई देती है. इसकी थ्रेशिंग करने पर दाना बिल्कुल गेहूं की तरह निकलता है. हललेस जौ का मतलब है कि इसमें से केवल छिलका निकाला जाता है और यह साबुत अनाज माना जाता है.
खास किस्म का जौ शुगर मरीजों के लिए गेहूं से भी बेहतर
पशुओं को खिलाने के लिए भी जौ की ऐसी किस्म भी विकसित की जा रही हैं, जिसमें ‘ऑन्स’ नहीं होते, जिससे पशुओं के गले में फंसने की समस्या नहीं होती और दाना व चारा दोनों मिलता है. कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि जौ एक सुपरफूड भी है. इससे सत्तू बनाया जाता है और यह पोषण से भरपूर होता है. इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 25 से 30 के बीच होता है, जबकि गेहूं का लगभग 80 होता है, जिससे यह शुगर के मरीजों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है.
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वैज्ञानिकों ने कई खूबियों से लैस काला चना किस्म तैयार
राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (RARI) के कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि मंत्री को बताया कि संस्थान काले चने की उन्नत वैरायटी विकसित की है. इस काले चने की वैरायटी में एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं, और इसमें आयरन और जिंक की मात्रा भी ज्यादा होती है. यह एक बायो फोर्टिफाइड वैरायटी है. इसका मेडिसिन में भी उपयोग होता है. इसके पौधे की हाइट इतनी है कि यह मैकेनिकल हार्वेस्टिंग के लिए बहुत उपयुक्त है. इसका उत्पादन 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है. अभी यह चने की वैरायटी एडवांस रिलीज की स्टेज में है.
चना की नई 20 वैरायटी विकसित की गईं
वैज्ञानिकों ने बताया कि संस्थान की ओर से चने की 20 नई वैरायटी विकसित की गई हैं. इसमें इंटर नोड डिफरेंस कम होने से फलियां ज्यादा बनती हैं, जिससे किसानों को बेहतर पैदावार मिलती है. यह किस्में हीट टॉलरेंट भी हैं. कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि किसानों को कम लागत में ज्यादा उत्पादन देने का ध्यान रखते हुए यह नई चना किस्में विकसित की गई हैं, जो मौसम, जलवायु अनुकूल हैं और कम सिंचाई और खाद इस्तेमाल के साथ ही पौधों की ऊंचाई कम रहने के चलते आंधी-तूफान में फसल गिरने से भी बचेगी.
रोग पहचान के लिए खास फील्ड तैयार की गई
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि संस्थान में रोग पहचान के लिए अद्भुत प्रयोग किए जा रहे हैं. संस्थान की ओर से एक विशेष फील्ड विकसित की गई है, जहां वैज्ञानिक गेहूं और जौ की किस्मों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का परीक्षण करते हैं. इस प्रक्रिया के अंतर्गत फसलों में लगने वाली येलो रस्ट जैसी बीमारियों की पहचान की जाती है. जो किस्में रस्ट रहित पाई जाती हैं, उन्हें आगे रिलीज किए जाने के लिए उपयुक्त माना जाता है. उन्होंने कहा कि इन प्रयोगों से किसानों को ऐसी उन्नत और रोग-प्रतिरोधी किस्में उपलब्ध कराने में सहायता मिलती है, जिससे उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ फसल हानि और लागत में कमी आती है. यह अनुसंधान किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है.