चीनी उद्योग के सामने गंभीर चुनौती, रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद कमजोर बनी हुई है मांग

भारत का चीनी उद्योग 2025-26 में रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद संकट में है. कमजोर मांग, इथेनॉल में कम डायवर्जन और गिरती कीमतों से मिलों पर दबाव बढ़ा है. नकदी संकट और किसानों के भुगतान में देरी की आशंका के बीच उद्योग संगठनों ने सरकार से तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की मांग की है.

Kisan India
नोएडा | Published: 12 Jan, 2026 | 10:30 PM

भारत का चीनी उद्योग 2025-26 सीजन में गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है. एक ओर चीनी का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, वहीं दूसरी ओर मांग कमजोर बनी हुई है. इथेनॉल में चीनी का सीमित उपयोग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरती कीमतों ने संकट को और बढ़ा दिया है. तेज पेराई के बावजूद चीनी का भंडार बढ़ रहा है, जिससे मिलों का मुनाफा घट रहा है और किसानों को भुगतान में देरी की आशंका जताई जा रही है. उद्योग संगठनों ने हालात संभालने के लिए सरकार से तुरंत नीतिगत हस्तक्षेप की मांग की है.

भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा निर्माता संघ (ISMA) के अनुसार, 31 दिसंबर 2025 तक चीनी उत्पादन  करीब 119 लाख टन पहुंच गया, जो पिछले साल से 25 फीसदी ज्यादा है. महाराष्ट्र 48.61 लाख टन के साथ सबसे आगे रहा, जबकि उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में भी बढ़ोतरी दर्ज हुई. पूरे सीजन में उत्पादन का अनुमान 34 से 35 मिलियन टन के बीच है, जिसका कारण रकबा बढ़ना है.

मांग का अनुमान 28- 28.5 मिलियन टन है

हालांकि, घरेलू खपत में नरमी दिख रही है. मांग का अनुमान 28- 28.5 मिलियन टन है. स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता इसका बड़ा कारण है. सरकार और FSSAI की पहल, जैसे स्कूलों और सार्वजनिक जगहों पर ‘शुगर बोर्ड’, ज्यादा चीनी सेवन  के नुकसान बताती हैं. देश में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से प्रभावित हैं और मोटापे की चिंता भी बढ़ रही है, जिससे चीनी की खपत पर असर पड़ा है.

इथेनॉल की ओर कम डायवर्जन से चीनी उद्योग की परेशानी और बढ़ गई है. नवंबर 2025 में 20 फीसदी ब्लेंडिंग हासिल होने के बावजूद, 2025-26 इथेनॉल सप्लाई ईयर में तेल कंपनियों ने चीनी आधारित कच्चे माल से सिर्फ 289- 307 करोड़ लीटर इथेनॉल का ही आवंटन किया. खाद्य सुरक्षा को देखते हुए अनाज से बनने वाले इथेनॉल को प्राथमिकता दी गई, जिससे चीनी से डायवर्जन सिर्फ 34 लाख टन तक सीमित रह गया, जबकि मिलें 50 लाख टन का लक्ष्य लेकर चल रही थीं. इससे बाजार में चीनी की मात्रा और बढ़ गई.

चीनी कीमतें 3,600- 3,720 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास 

अधिक आपूर्ति का असर कीमतों पर साफ दिख रहा है. महाराष्ट्र में एक्स-मिल चीनी कीमतें 3,600- 3,720 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास हैं, जो सीजन की शुरुआत से 8-10 फीसदी कम हैं और कई मिलों की लागत से नीचे हैं. सरकार की 15 लाख टन चीनी निर्यात कोटा योजना को भी वैश्विक कीमतें कमजोर होने के कारण खास प्रतिक्रिया नहीं मिली है. इस पर मार्च 2026 के बाद समीक्षा की जा सकती है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य 2019 से 31 रुपये प्रति किलो 

वहीं, मिलों पर दबाव और बढ़ गया है. भंडारण की कमी के चलते महाराष्ट्र में कुछ डिस्टिलरियों को काम रोकना पड़ा है. शीरा (मोलासेस) जमा होने से फैक्ट्रियों के बंद होने का खतरा भी है. गन्ने का एफआरपी 355 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य  2019 से 31 रुपये प्रति किलो पर ही अटका है. इससे नकदी संकट गहरा रहा है और किसानों के बकाया बढ़ने का जोखिम है.

1,800 करोड़ लीटर से ज्यादा की डिस्टिलरी क्षमता

अब पूरा मामला नीतिगत फैसलों पर टिका है. ISMA और NFCSF जैसे उद्योग संगठन इथेनॉल कीमतें बढ़ाने, चीनी का एमएसपी 39- 41 रुपये प्रति किलो करने और निर्यात बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि 1,800 करोड़ लीटर से ज्यादा की डिस्टिलरी क्षमता का सही इस्तेमाल होना चाहिए. सीजन की आधी पेराई पूरी हो चुकी है- एक तरफ कम खपत से स्वास्थ्य को फायदा मिल रहा है, तो दूसरी ओर किसानों की आय और जैव-ईंधन लक्ष्य दांव पर हैं. अगर समय पर राहत नहीं मिली, तो चीनी का यह ज्यादा उत्पादन लाखों गन्ना किसानों और मिलों के लिए बड़ी समस्या बन सकता है.

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Published: 12 Jan, 2026 | 10:30 PM

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