Marathwada farmer suicides: महाराष्ट्र के मराठवाड़ा की धरती कभी मेहनत और उम्मीद की पहचान रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यही इलाका किसानों के दर्द की सबसे बड़ी तस्वीर बन गया है. मौसम की मार, फसलों का बार-बार चौपट होना और कर्ज का बढ़ता बोझ यहां के किसानों को लगातार तोड़ रहा है. ताजा सरकारी संभागीय आयुक्त कार्यालय रिपोर्ट ने एक बार फिर इस सच्चाई को सामने रख दिया है कि मराठवाड़ा का कृषि संकट कितना गहरा हो चुका है कि किसानों ने आत्महत्या जैसे कदम उठाने पड़ रहे हैं.
आंकड़े जो झकझोर देते हैं
पिछले पांच सालों में मराठवाड़ा क्षेत्र में 5,075 किसानों ने आत्महत्या की है. इनमें सबसे ज्यादा मामले साल 2025 में सामने आए, जब 1,129 किसानों ने अपनी जान गंवा दी.
- 2021 में 887 किसानों ने आत्महत्या की.
- 2022 में 1,023 किसान आत्महत्या के शिकार हुए.
- 2023 में 1,088 किसानों ने जान गंवाई.
- 2024 में 948 किसानों की आत्महत्या दर्ज की गई.
ये आंकड़े साफ दिखाते हैं कि मराठवाड़ा में कृषि संकट हर साल गहराता गया, हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते चले गए.
जिलेवार तस्वीर और बढ़ती चिंता
द वीक की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्याएं बीड जिले से सामने आईं, जहां 256 किसानों की मौत दर्ज की गई. इसके बाद छत्रपति संभाजीनगर में 224, नांदेड़ में 170, धाराशिव में 141, परभणी में 104, जालना में 90, लातूर में 76 और हिंगोली में 68 किसानों ने आत्महत्या की. सरकार की ओर से बीते साल 193 पीड़ित परिवारों को अनुग्रह सहायता दी गई, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मदद दर्द को भरने के लिए काफी है.
मौसम बना सबसे बड़ा दुश्मन
मराठवाड़ा के किसान पहले ही अनिश्चित बारिश से जूझते रहे हैं, लेकिन 2025 में हालात और कठिन हो गए. मई महीने में कई इलाकों में बेमौसम बारिश हुई, जबकि कुछ जिलों में सामान्य से 125 से 150 प्रतिशत तक ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई. इसके बाद सितंबर और अक्टूबर में आई बाढ़ ने फसलों को पूरी तरह तबाह कर दिया. जिन खेतों से किसान पूरे साल की उम्मीद लगाए बैठे थे, वही खेत कुछ ही दिनों में बर्बादी की मिसाल बन गए.
बारिश, बाढ़ और टूटती उम्मीदें
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 में हुई कुल आत्महत्याओं में से 537 मामले मई से अक्टूबर के बीच सामने आए. यही वह दौर था जब बारिश और बाढ़ ने मराठवाड़ा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया. फसलें खराब हुईं, कर्ज चुकाने की क्षमता खत्म हो गई और किसानों के सामने परिवार पालने का संकट खड़ा हो गया. ऐसे हालात में कई किसानों ने जिंदगी से हार मान ली.
समाधान की तलाश अब भी अधूरी
मराठवाड़ा का यह संकट सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांव-गांव की कहानी बन चुका है. किसान संगठनों का कहना है कि जब तक सिंचाई, फसल बीमा, कर्ज राहत और स्थायी आय के ठोस उपाय जमीन पर नहीं उतरते, तब तक यह दर्द यूं ही बढ़ता रहेगा. मराठवाड़ा आज सिर्फ मदद नहीं, बल्कि लंबे समय तक साथ निभाने वाली नीतियों की मांग कर रहा है.