मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में परंपरागत फसलों की घटती पैदावार और बढ़ती लागत के बीच महिला किसानों ने नवाचार की नई पहल की है. महिला किसानों ने कस्तूरी भिंडी की खेती की है, जिससे अच्छी उपज और कमाई हासिल हो रही है. उपज की कीमत 30 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक मिलने के चलते महिला किसान खुश हैं. जून-जुलाई में बोई गई फसल अब बिक्री की जा रही है. वहीं, औषधीय गुणों के चलते कस्तूरी भिंडी की अच्छी कीमत तो मिल ही रही है और इसकी डिमांड भी खूब है. बड़ी संख्या में महिलाओं ने खरीफ सीजन में कस्तूरी भिंडी की खेती की है. जबकि, फरवरी और मार्च के दौरान भी कई हजार हेक्टेयर में इसकी खेती का टारगेट निर्धारित किया गया है.
खंडवा की महिलाओं को मिल रहा 30 हजार का भाव
खंडवा जिले की महिलाओं ने आजीविका स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर नई किस्मों की खेती की ओर रुख किया है. इसके तहत समूह से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं ने कस्तूरी भिंडी की खेती अपनाई है, जिससे बेहतर आय के संकेत मिल रहे हैं. जून–जुलाई में बोई गई यह फसल जनवरी तक चलती है और इस वक्त कटाई के साथ ही उपज की बिक्री की जा रही है. महिला किसानों के अनुसार प्रति एकड़ 7 से 10 कुंटल तक बीज उत्पादन मिल रहा है. बीजों की कीमत 25 हजार से 30 हजार रुपये क्विंटल मिल रहा है.
औषधीय इस्तेमाल के साथ इत्र के लिए खूब डिमांड
कस्तूरी भिंडी के बीजों की प्राकृतिक सुगंध के कारण परफ्यूम और अत्तर उद्योग में इसकी मांग बढ़ रही है, जिससे किसानों को अच्छा बाजार मूल्य मिल रहा है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह फसल कम लागत, अधिक उत्पादन और दोगुना मुनाफा दे रही है, जिससे यह कपास का मजबूत विकल्प बनती जा रही है. वहीं, महिला किसानों ने खरीफ सीजन में बोई गई फसल को जनवरी में कटाई के बाद फरवरी-मार्च में फिर से इसकी बुवाई करने का मन बनाया है. बुवाई के लगभग 120 से 140 दिन बाद फसल तैयार हो जाती है.
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कस्तूरी भिंडी की खेती कैसे की जाती है
उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के अनुसार कस्तूरी भिंडी की खेती के लिए गर्म जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इसकी अच्छी बढ़वार के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान जरूरी होता है. दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो, इस फसल के लिए बेहतर रहती है. खेत की तैयारी के समय 2–3 गहरी जुताई करके मिट्टी भुरभुरी कर ली जाती है और प्रति हेक्टेयर 15–20 टन सड़ी गोबर की खाद मिला दी जाती है. इसकी बुवाई आमतौर पर जून–जुलाई में मानसून के साथ की जाती है. कतार से कतार की दूरी लगभग 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखी जाती है. बुवाई के बाद हल्की सिंचाई की जाती है और आगे चलकर 10–15 दिन के अंतर पर जरूरत के अनुसार पानी दिया जाता है.
कस्तूरी भिंडी को तना छेदक, माहू कीटों से बचाना जरूरी
कस्तूरी भिंडी की फसल में मुख्य रूप से फल एवं तना छेदक, माहू (एफिड), सफेद मक्खी और थ्रिप्स जैसे कीटों का प्रकोप देखा जाता है. ये कीट पौधों की पत्तियों का रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देते हैं, जिससे फसल की बढ़वार रुक जाती है. इसके नियंत्रण के लिए नीम तेल या नीम आधारित कीटनाशकों का छिड़काव किया जा सकता है. साथ ही फेरोमोन ट्रैप और पीले चिपचिपे ट्रैप का उपयोग करने से कीटों की संख्या कम करने में मदद मिलती है. समय पर निगरानी और जैविक उपाय अपनाने से फसल को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है.