Cow Care Tips : गांवों में गाय-भैंस सिर्फ दूध देने वाला पशु नहीं, बल्कि घर की रोज़ी-रोटी का मजबूत सहारा होती हैं. लेकिन कई बार जानकारी की कमी के कारण पशुपालक ऐसी गलती कर बैठते हैं, जिससे न दूध बढ़ता है और न ही पशु स्वस्थ रह पाता है. गाभिन गाय-भैंस की सही समय पर देखभाल और दूध बंद करने का तरीका अपनाया जाए, तो अगली ब्यांत में दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और बछड़े की सेहत भी बेहतर होती है.
ड्राई पीरियड क्या है और क्यों जरूरी माना जाता है
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गाय या भैंस के बच्चा देने से करीब दो महीने पहले दूध निकालना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए. इसी समय को ड्राई पीरियड कहा जाता है. आमतौर पर गर्भावस्था के 7वें या 8वें महीने से दूध निकालना धीरे-धीरे कम करना सही माना जाता है. इस दौरान थनों को आराम मिलता है और गर्भ में पल रहे बछड़े का शारीरिक विकास अच्छे से हो पाता है.
दूध बंद न करने से होने वाले नुकसान
अगर गाभिन गाय या भैंस से बच्चा होने के आखिरी समय तक लगातार दूध निकाला जाता है, तो इसका उसकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है. इससे थन कमजोर हो जाते हैं और अगली ब्यांत में दूध उत्पादन पहले की तुलना में कम हो सकता है. इसके साथ ही पशु के शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता, जिससे अंदरूनी ऊतकों की मरम्मत नहीं हो पाती. ऐसे मामलों में दूध ज्वर यानी मिल्क फीवर का खतरा भी बढ़ जाता है, जो बच्चा होने के बाद अचानक कमजोरी, खड़े न हो पाने और भूख कम लगने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है. समय पर दूध बंद न करने से पशु लंबे समय तक बीमार भी रह सकता है.
गर्भावस्था में पोषण का रखें खास ध्यान
मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि गाय और भैंस का गर्भकाल अलग-अलग होता है, लेकिन दोनों ही पशुओं में गर्भावस्था के आखिरी दो से तीन महीने सबसे अहम माने जाते हैं. इसी दौरान गर्भ में पल रहे बछड़े की शारीरिक वृद्धि तेजी से होती है. ऐसे समय में अगर पशु को संतुलित और पोषण से भरपूर आहार न मिले, तो बछड़ा कमजोर रह सकता है. सही मात्रा में दाना, हरा चारा और जरूरी पोषक तत्व मिलने से बछड़ा मजबूत पैदा होता है. इसके साथ ही मां पशु की ताकत बनी रहती है और बच्चा होने के बाद उसे जल्दी कमजोरी नहीं आती. संतुलित आहार से अगली ब्यांत में दूध उत्पादन भी बेहतर मिलता है.
आखिरी हफ्तों में ऐसे बदलें आहार
बच्चा होने से करीब तीन सप्ताह पहले पशु के आहार में बदलाव करना जरूरी होता है. भूसे की मात्रा थोड़ी कम करनी चाहिए और दाना रोजाना करीब 100 ग्राम तक बढ़ाना चाहिए. वहीं कैल्शियम और मिनरल मिक्सचर की मात्रा 15 ग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ज्यादा मात्रा देने से बच्चा होने के बाद मिल्क फीवर की समस्या हो सकती है.
छोटी सावधानियां, बड़ा फायदा
मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि ड्राई पीरियड के दौरान साफ-सफाई, आराम और तनाव-मुक्त माहौल बेहद जरूरी है. समय-समय पर पशु की निगरानी करने से किसी भी परेशानी को पहले ही पहचाना जा सकता है. अगर इन बातों का सही तरीके से पालन किया जाए, तो अगली ब्यांत में दूध उत्पादन बढ़ता है और पशुपालक को ज्यादा मुनाफा मिलता है.