Milk Production : अगर कोई कहे कि मध्यप्रदेश अब खेती के साथ-साथ दूध उत्पादन में भी बड़ी ताकत बन चुका है, तो यह बात बिल्कुल सही साबित होती है. बीते सात सालों में प्रदेश ने दूध उत्पादन के क्षेत्र में जबरदस्त छलांग लगाई है. हालात ऐसे हैं कि आज मध्यप्रदेश देश का तीसरा सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य बन चुका है. गांव-गांव में पशुपालन किसानों की आमदनी का मजबूत सहारा बनता जा रहा है और इसका सीधा असर प्रदेश के आंकड़ों में साफ दिख रहा है.
7 साल में बदली तस्वीर, 60 लाख टन बढ़ा दूध उत्पादन
मध्यप्रदेश में दूध उत्पादन लगातार बढ़ता जा रहा है. साल 2018-19 में जहां प्रदेश का कुल दूध उत्पादन करीब 170 लाख टन था, वहीं 2024-25 तक यह आंकड़ा बढ़कर 230 लाख टन के करीब पहुंच गया है. यानी सात साल में लगभग 60 लाख टन की बढ़ोतरी दर्ज की गई. हर साल उत्पादन में सुधार हुआ है, जिससे साफ है कि पशुपालन अब सिर्फ सहायक काम नहीं, बल्कि किसानों की आय का मजबूत जरिया बन चुका है.
देश की जरूरत का 9.12 फीसदी दूध दे रहा मध्यप्रदेश
दूध उत्पादन बढ़ने का असर अब राष्ट्रीय स्तर पर भी दिख रहा है. मध्यप्रदेश आज देश की कुल दूध जरूरत का 9.12 प्रतिशत हिस्सा अकेले पूरा कर रहा है. इस उपलब्धि के साथ प्रदेश देश में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है. पहले नंबर पर पंजाब और दूसरे स्थान पर राजस्थान है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही रफ्तार बनी रही, तो आने वाले सालों में मध्यप्रदेश दूसरे स्थान की ओर भी बढ़ सकता है.
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मुरैना टॉप पर, बुरहानपुर सबसे पीछे
प्रदेश के जिलों की बात करें तो दूध उत्पादन में बड़ा अंतर देखने को मिलता है. मुरैना जिला सबसे आगे है, जहां 866 टन से ज्यादा दूध का उत्पादन होता है. इसके बाद उज्जैन, शिवपुरी, रीवा, देवास, सीहोर, राजगढ़, सागर, भिंड और छतरपुर टॉप-10 जिलों में शामिल हैं. ये जिले मिलकर प्रदेश के कुल दूध उत्पादन का बड़ा हिस्सा देते हैं. वहीं दूसरी तरफ बुरहानपुर सबसे नीचे है, जहां केवल 85.64 टन दूध उत्पादन होता है. इसके अलावा अनूपपुर, डिंडौरी, उमरिया, मंडला, हरदा, अलीराजपुर, झाबुआ, कटनी और नरसिंहपुर भी कम उत्पादन वाले जिलों में गिने जाते हैं.
दुधारू पशुओं की बड़ी ताकत, 4 करोड़ से ज्यादा पशु
मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी ताकत उसके दुधारू पशु हैं. प्रदेश में करीब 4.03 करोड़ दुधारू पशु मौजूद हैं. इनमें लगभग 1 करोड़ 87 लाख गोवंश, 1 करोड़ 3 लाख भैंस, 3.24 लाख भेड़ और 1 करोड़ 10 लाख बकरियां शामिल हैं. इतनी बड़ी संख्या में पशुओं की मौजूदगी ही दूध उत्पादन की रीढ़ मानी जाती है.
नस्ल सुधार और गर्भाधान से किसानों को बड़ा फायदा
दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने पशुओं की नस्ल सुधार पर भी खास ध्यान दिया है. बीते तीन वर्षों में प्रदेशभर में 41 लाख से ज्यादा पशुओं का गर्भाधान किया गया. वहीं 56 लाख से अधिक कृत्रिम गर्भाधान कराए गए, जिससे दूध देने की क्षमता बढ़ी है. इन प्रयासों का सीधा फायदा करीब 22.90 लाख किसानों को मिला है. गांवों में पशुपालन अब रोजगार और आमदनी का भरोसेमंद साधन बनता जा रहा है.
पशुपालन से मजबूत हो रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था
दूध उत्पादन में बढ़ोतरी का असर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है. इससे गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, किसानों की आमदनी बढ़ रही है और युवाओं को भी रोजगार के नए मौके मिल रहे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर दूध संग्रह, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग पर और काम किया गया, तो मध्यप्रदेश आने वाले समय में दूध उत्पादन में और बड़ी पहचान बना सकता है.