EU व्यापार समझौते से सेब किसानों में बढ़ी नाराजगी, क्या स्थानीय सेब कारोबार होगा प्रभावित?

EU सेब आयात शुल्क घटाने से भारत के सेब उत्पादक किसान चिंतित हैं. युवा किसान और आधुनिक बागवानी को जोखिम का सामना करना पड़ सकता है. विशेषज्ञों ने सरकार से सब्सिडी, उपकरण और समर्थन की मांग की है, ताकि विदेशी प्रतिस्पर्धा के बावजूद स्थानीय सेब अर्थव्यवस्था बची रहे.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 30 Jan, 2026 | 01:38 PM

यूरोपीय संघ (EU) से आने वाले सेब पर आयात शुल्क घटाए जाने से हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक किसानों में नाराजगी बढ़ गई है. संयुक्त किसान मंच के संयोजक हरीश चौहान ने कहा है कि केंद्र सरकार ने दूसरे क्षेत्रों को फायदा पहुंचाने के लिए सेब उत्पादकों को ‘बलि का बकरा’ बना दिया है. उन्होंने इसे स्थानीय सेब अर्थव्यवस्था पर बड़ा झटका बताया. EU के साथ हुए व्यापार समझौते में सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है. शुरुआती तौर पर आयात की सीमा 50 हजार मीट्रिक टन सालाना तय की गई है और न्यूनतम आयात मूल्य 80 रुपये प्रति किलो रखा गया है. इसके अलावा, नाशपाती और कीवी पर भी आयात शुल्क में कटौती की गई है. इससे पहले न्यूजीलैंड से आने वाले सेब पर शुल्क 50 से घटाकर 25 प्रतिशत किया जा चुका है.

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, हरीश चौहान ने आशंका जताई कि भविष्य में अमेरिका के साथ संभावित मुक्त व्यापार समझौते  (FTA) में सेब पर आयात शुल्क में और बड़ी कटौती की मांग की जा सकती है, जिससे हालात और गंभीर हो जाएंगे. वहीं, सेब उत्पादक क्षेत्र ठियोग से कांग्रेस विधायक कुलदीप राठौर ने भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि पहले से ही बढ़ती लागत और मौसम की मार से जूझ रही सेब अर्थव्यवस्था पर यह फैसला अतिरिक्त दबाव डालेगा. राठौर के मुताबिक, आयात शुल्क घटाने से लाखों परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है.

सबसे ज्यादा असर युवाओं पर पड़ेगा

फल उत्पादक संघ के अध्यक्ष दीपक सिंघा ने कहा कि अगर राज्य में फल उत्पादन  लाभकारी नहीं रहा, तो इसका सबसे ज्यादा असर युवाओं पर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में कई शिक्षित युवा बागवानी की ओर आए हैं, जिन्होंने आधुनिक तकनीक से फल उगाने के लिए कर्ज लिया है. अगर फल खेती घाटे का सौदा बनी, तो ये युवा गंभीर संकट में फंस सकते हैं.

सरकार के सहयोग की सख्त जरूरत है

प्रगतिशील उत्पादक संघ के अध्यक्ष लोकिंदर बिष्ट ने इसे सेब अर्थव्यवस्था पर बड़ा झटका बताते हुए कहा कि अगर आयात शुल्क  में कटौती टालना संभव नहीं है, तो सरकार को कीटनाशकों, उपकरणों और पौध सामग्री पर सब्सिडी जरूर देनी चाहिए. उन्होंने कहा कि विदेशों में सेब की खेती अधिक यंत्रीकृत और सब्सिडी आधारित है. ऐसे में किसानों को बराबरी का मौका देने के लिए प्रोत्साहन और सहायता जरूरी है. बिष्ट ने कहा कि गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए किसान आधुनिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन इस बदलाव के दौर में उन्हें सरकार के सहयोग की सख्त जरूरत है.

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Published: 30 Jan, 2026 | 01:38 PM

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