हिमाचल प्रदेश में 3 महीने से बारिश नहीं होने से फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है. करीब 5 लाख हेक्टेयर में फसलें प्रभावित हुई हैं. सबसे ज्यादा गेहूं, आलू और प्याज की फसल प्रभावित हुई है. जबकि, बागवानी फसलों की उत्पादन क्वालिटी खराब होने का खतरा बढ़ गया है. मिट्टी में नमी नहीं होने से खेतों में खड़ी फसल पीली पड़ने लगी है. किसानों का कहना है कि अगर जल्द बारिश नहीं हुई तो फसलों को बचाना मुश्किल होगा. हालात को देखते हुए कृषि विभाग और उद्यान विभाग के अधिकारी फसल बचाने के लिए किसानों को जागरूक कर रहे हैं.
गेहूं, आलू, लहसुन और प्याज समेत अन्य फसलों को नुकसान
लंबे ड्राई स्पेल के चलते सोलन जिले के अर्की उपमंडल में किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. पिछले करीब साढ़े तीन महीनों से बारिश न होने के कारण गेहूं, जौ, आलू, लहसुन और प्याज जैसी रबी फसलें खराब होने के साथ-साथ सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं. उपमंडल के विभिन्न क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि रबी सीजन की अधिकांश फसलें वर्षा पर आधारित होती हैं. लंबे समय से बारिश न होने के कारण फसलों को पर्याप्त नमी नहीं मिल पा रही है, जिससे वे पीली पड़ने लगी हैं और उत्पादन पर भारी असर पड़ने की आशंका है.
किसानों की कृषि विभाग सूखा राहत जारी करने की मांग
किसानों ने प्रसार भारती को बताया कि बारिश के अभाव में घास और पेड़-पौधों पर धूल जम गई है, जिसके कारण पशुधन को भी धूल युक्त चारा खिलाना पड़ रहा है. सूखे जैसे हालातों को देखते हुए किसानों ने कृषि विभाग और प्रदेश सरकार से प्रभावित फसलों का जल्द आकलन करवाकर राहत राशि देने की मांग की है. किसानों का कहना है कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई, तो आने वाले समय में नुकसान और भी बढ़ सकता है.
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सेब समेत अन्य बागवानी फसलों के लिए चिंलिंग जरूरी
उद्यान विभाग किन्नौर के उपनिदेशक शमशेर सिंह ढेहरू ने सूखे की स्थिति पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि दिसंबर और जनवरी माह में बर्फबारी न होने से बागवानी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसका सीधा असर सेब सहित अन्य फल फसलों की पैदावार पर दिखाई देता है. उन्होंने कहा कि बागवानी की दृष्टि से फरवरी माह की बर्फबारी उतनी लाभकारी नहीं होती, क्योंकि इस समय तक मौसम खुलने लगता है और तापमान में भी वृद्धि हो जाती है. सेब की फसल के लिए 800 से 1600 घंटे की चिलिंग जरूरी होती है, जो 15 दिसंबर से 15 फरवरी के बीच पूरी होती है. अगर इस अवधि में दिसंबर और जनवरी के दौरान बर्फबारी नहीं होती, तो चिलिंग की पूर्ति नहीं हो पाएगी, जिससे फलन और क्वालिटी दोनों पर असर पड़ेगा.
टपक सिंचाई योजना और फव्वारा योजना का लाभ लें किसान
सूखे से फसलों को बचाने के लिए उपनिदेशक शमशेर सिंह ढेहरू ने किसानों और बागवानों को पहले से तैयारी करने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि प्रत्येक बागवान को अपने खेत या बगीचे के कोने में सिंचाई टैंक का निर्माण करना चाहिए, ताकि वर्षा जल का संचय किया जा सके. इसके लिए उद्यान विभाग तथा मनरेगा योजना के अंतर्गत वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है, जिसका लाभ किसान और बागवान उठा सकते हैं. उन्होंने कहा कि उद्यान विभाग की ओर से टपक सिंचाई योजना और फव्वारा सिंचाई योजना के तहत 80 फीसदी तक अनुदान दिया जा रहा है. इन योजनाओं का लाभ लेने के लिए पहले सिंचाई टैंक का निर्माण जरूरी है.
सामान्य से 83 फीसदी कम बारिश से फसल सूखने की कगार पर
हिमाचल प्रदेश में करीब 7 लाख हेक्टेयर में फसलें और बागवानी की जाती है. लेकिन, ऊना, हमीरपुर, सोलन, बिलासपुर, किन्नौर, कुल्लू समेत कई अन्य जिलों में कम बारिश से सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं. हिमाचल के ज्यादातर जिलों में खेती बारिश पर निर्भर है. राज्य मौसम विभाग के अनुसार सामान्य से 83 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है. इससे इन इलाकों में रबी फसलों जैसे गेहूं की बुवाई, अंकुरण और पौधे की ग्रोथ में नमी की कमी के कारण बुरा असर पड़ रहा है.

3 महीने से बारिश नहीं होने से सूखे खेतों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है.
कुल्लू घाटी में तीन महीने से सूखे जैसे हालात
कुल्लू घाटी में तीन महीने से सूखे के हालात बने हुये हैं. आमतौर पर हर अक्टूबर-नवंबर में बारिश होती है. लेकिन, इस बार बारिश नहीं होने से खेतों में फसलें सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं. खेत खलियानों में पर्याप्त नमी न होने से बुवाई प्रभावित हुई है और बाग-बगीचों में खाद तौलिए बनाने का काम पर भी बुरा असर पड़ा है. इससे सेब समेत अन्य फलों की क्वालिटी, उत्पादन प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है.
बारिश नहीं हुई तो ऊना में गेहूं उत्पादन घट जाएगा
सबसे कम बारिश वाले जिले ऊना में कृषि विभाग के उपनिदेशक कुलभूषण धीमान ने कहा कि बारिश न होने से किसानों और बागवानों की चिंता बढ़ गई है. गेहूं की फसल गैर-सिंचित क्षेत्रों में सूखे की चपेट में है, जिससे उत्पादन घटने की आशंका बढ़ गई है. खेतों में खड़ी फसल का पीला पड़ना इस बात का संकेत है कि पौधों को आवश्यक नमी नहीं मिल पा रही है. जिले में लगभग 35 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की खेती की जाती है. इसमें केवल करीब 45 फीसदी क्षेत्र ही सिंचित है. शेष 40 फीसदी से अधिक क्षेत्र पूरी तरह वर्षा आधारित है, जहां इस समय सूखे जैसे हालात बने हुए हैं. उपमंडल अंब और बंगाणा के कई क्षेत्र सूखे से सबसे अधिक प्रभावित बताए जा रहे हैं.