Integrated Farming : महंगे चारे, सीमित जमीन और बढ़ते खर्चों के बीच आज का किसान ऐसे तरीकों की तलाश में है, जिससे कम लागत में अच्छी आमदनी हो सके. खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है. ऐसे समय में इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम एक नई उम्मीद बनकर सामने आया है. यह ऐसा तरीका है, जिसमें एक ही शेड में बकरी और मुर्गी पालन को जोड़कर खर्च घटाया जाता है और मुनाफा बढ़ाया जाता है.
एक शेड, दो इंतजाम और पूरा फायदा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया में एक ऐसा शेड बनाया जाता है, जहां बकरी और मुर्गियां पास-पास रहती हैं, लेकिन दोनों के बीच लोहे की मजबूत जाली लगी होती है. इससे वे एक-दूसरे के संपर्क में नहीं आतीं और बीमारी फैलने का खतरा भी कम रहता है. अलग-अलग शेड बनाने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे निर्माण पर होने वाला खर्च बच जाता है. कम जमीन वाले किसान भी आसानी से यह मॉडल अपना सकते हैं.
बकरियों का बचा चारा, मुर्गियों की थाली
इस सिस्टम की सबसे बड़ी खूबी है चारे की बचत. बकरियां दिन में बाहर चरने जाती हैं और उनके हिस्से में गिरा हरा चारा शेड में रह जाता है. उसी समय मुर्गियों को उस हिस्से में छोड़ दिया जाता है. मुर्गियां बकरियों के बचे हुए चारे को चुग लेती हैं. इससे रोजाना उनके दाने की जरूरत 30 से 40 ग्राम तक कम हो जाती है. महीने भर में यह बचत अच्छी-खासी रकम में बदल जाती है.
अजोला से बने सस्ते और पौष्टिक दाने
इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम में अजोला उत्पादन को भी शामिल किया गया है. बकरी की मेंगनी, मिट्टी और पानी की मदद से घर के पास एक उथली टंकी में अजोला आसानी से उगाया जा सकता है. अजोला प्रोटीन से भरपूर होता है और मुर्गियों के लिए बहुत अच्छा आहार माना जाता है. रोजाना 200 से 300 ग्राम तक अजोला मिल जाता है, जिससे बाजार से दाना खरीदने का खर्च काफी कम हो जाता है. इसके साथ ही मुर्गियों की सेहत और अंडा उत्पादन भी बेहतर होता है.
छोटे किसानों के लिए बड़ी कमाई का रास्ता
यह मॉडल खास तौर पर उन किसानों के लिए फायदेमंद है, जिनके पास जमीन और पूंजी दोनों सीमित हैं. मुर्गी पालन की लागत 40 से 50 प्रतिशत तक घट जाती है, जबकि बकरी पालन से नियमित आय बनी रहती है. अजोला उत्पादन से अतिरिक्त बचत होती है. एक ही शेड से कई तरह की आमदनी निकलती है. कम निवेश, कम जोखिम और ज्यादा मुनाफा-यही इस सिस्टम की असली ताकत है. यही वजह है कि आज कई किसान इस मॉडल को अपनाकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं और पशुपालन से अपनी आमदनी दोगुनी कर रहे हैं.