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फसल पर कीड़े-मकौड़ों का हमला? तो कीटनाशक नहीं, ये प्राकृतिक तरीके अपनाइए
धीरे-धीरे किसान यह समझने लगे हैं कि अगर फसल को प्राकृतिक तरीके से सुरक्षित रखा जाए, तो न केवल मिट्टी उपजाऊ बनी रहती है, बल्कि लागत भी कम होती है और पैदावार ज्यादा टिकाऊ होती है. अच्छी बात यह है कि प्रकृति ने खुद हमें ऐसे कई उपाय दिए हैं, जिनसे कीटों को बिना जहर के नियंत्रित किया जा सकता है.
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पीली, लाल और मुड़ी पत्तियां क्या कहती हैं? कपास किसान समय रहते समझ लें तो बचेगा बड़ा नुकसान
कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि पौधे की पत्तियां उसकी रसोई होती हैं. यहीं भोजन बनता है और यहीं से पौधे की ताकत तय होती है. अगर किसी कारण से पौधे को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते, तो उसका असर सबसे पहले पत्तियों पर दिखाई देता है. रंग बदलना, सिकुड़ना, सूखना या कमजोर पड़ना – ये सब संकेत होते हैं कि फसल के भीतर कुछ गड़बड़ चल रही है.
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लौंग की खेती में छिपा है तगड़ा मुनाफा, सही तरीके से करें शुरुआत तो बदल सकती है किस्मत
लौंग एक सदाबहार पेड़ होता है, जो लंबे समय तक उत्पादन देता है. इसका उपयोग मसाले के रूप में तो होता ही है, साथ ही आयुर्वेदिक दवाइयों, तेल, दंत चिकित्सा और सुगंधित उत्पादों में भी लौंग की अच्छी खपत है. यही कारण है कि बाजार में इसकी कीमत स्थिर बनी रहती है और किसानों को नुकसान की आशंका कम रहती है.
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हर साल मुनाफा देने वाला ये फल बना किसानों की पहली पसंद, कम मेहनत में होगा ज्यादा फायदा
नाशपाती को ताजा फल के रूप में खाने के साथ-साथ जूस, जैम और डेज़र्ट में भी इस्तेमाल किया जाता है. यही वजह है कि बाजार में इसकी कीमत अच्छी मिलती है. एक बार बाग तैयार हो जाने के बाद कई वर्षों तक नियमित उत्पादन मिलता रहता है, जिससे किसान को लंबे समय तक फायदा होता है.
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सिर्फ एक डाल और थोड़ी देखभाल, ऐसे तैयार होता है कटिंग से अंजीर का नया पौधा
अंजीर की कटिंग लगाने के लिए सर्दी का अंत और वसंत की शुरुआत सबसे अच्छा समय मानी जाती है. इस दौरान पौधा सुप्त अवस्था से बाहर आने लगता है और नई जड़ों के बनने की संभावना ज्यादा रहती है. बहुत ज्यादा ठंड या तेज गर्मी में कटिंग लगाने से सफलता कम हो जाती है.
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किसानों के लिए बेस्ट हैं प्याज की ये 7 किस्में, 95 दिनों में फसल हो जाएगी तैयार.. 500 क्विंटल तक पैदावार
पूसा व्हाईट फ्लैट: यह सफेद प्याज की किस्म है. रोपाई के 125-130 दिन में तैयार होती है. भंडारण क्षमता अच्छी है. इसकी उपज प्रति हेक्टेयर 325-350 क्विंटल है. वहीं, अर्ली ग्रेनो हल्के पीले रंग की किस्म है. रोपाई के 115-120 दिन में पकती है.








